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रेत घड़ी की टिक-टिक

Updated: Aug 5, 2021

मैक्सिम गोर्की को पढ़ते हुए....

बूढ़ी इजरगिल ठीक ही तो कह रही है, आस-पास ही देख लिया जाये तो प्लानिंग के इस दौर में जीना कितना कागज़ी होता चला जा रहा है!

"फैमिली कब प्लान कर रहे हो?"

"अब तो घर/कार प्लान कर लेना चाहिए"

जैसे सवालों में उलझे लोग एक गोल रेस ट्रैक का अंत ढूंढने की फिराक में उम्र भर दौड़ते जाते हैं. जब उम्र के सिक्कों की खनखनाहट कम से कमतर होने लगती है तब लगता है सारा खर्चा तो बेवजह ही हो गया.


किताबें पढ़ना बहुत अच्छी बात है, लेकिन जीने के लिए किताबी हिसाब-किताब फ्लैट, कार और लग्जरी भले दे दे, सुकून तो नहीं दे सकता !


हालांकि ये बातें लोगों को प्रैक्टिकल नहीं लगतीं, लेकिन सबसे बड़ी प्रैक्टिकैलिटी लाइफ की परफेक्ट प्लानिंग में नहीं बल्कि हर मूमेंट में उसे जी-भरकर जीने में है, कि रेत घड़ी की टिक-टिक जारी है...


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