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गुलज़ार, आदत और तुम – टू द अनबॉर्न

Updated: Aug 5, 2021

"आदतें भी अजीब होती हैं" गुलज़ार साहब कहते हैं.


कुछ आदतें थीं, जिनके 'होने' को ज्यादा वक्त नहीं गुजरा. बात-बेबात किसी से भी, कहीं भी उलझ जाना, लड़ना, जीतना, हक जमाना ! इसी बीच एक नई बात हुई कि तुमको महसूस किया. किसी को बिना देखे फील करना नई आदत बनने लगी.

हर वक्त हर जगह तुम्हारी 'प्रिजेंस' साथ लेकर चलना. नई-नई सी आदत से पुरानी आदतें एक-एक ब्लॉक पीछे खिसकने लगीं. नई वाली के लिए जगह बनानी थी न..!


पर आखिरी ब्लॉक के मेज से गिरने के पहले, एकदम कॉर्नर पर आकर बात रूक गई. वो क्या कहा था मैंने तीसरे दिन..."एंड यू लेफ्ट द डेथ साइलेंस बिहाइंड!" और फिर से शुरू हुआ स्लीपिंग पिल्स और साइकेट्रिक मेडिसन का सिलसिला.


इस बार जब जागती रातें वापस आयीं तो सब कुछ तो नहीं पर 'कुछ' बदला हुआ था. बदलना भी अधूरा था, जैसे तुम्हारा आना-जाना. अब उलझने का मन नहीं करता, लड़ने-झगड़ने की वजहें इग्नोर हो जाती हैं, और हक जमाना नर्वस फील कराता है.

मेरे पास ये बताने का कोई क्लू नहीं है कि तुम्हारे रहने से क्या होता और कैसा होता.


हां, आज अगर ये सब न लिखा जाता तो मैं भी 'राइटर्स ब्लॉक' की फ़ॉलोअर बन जाती. हालांकि सांसें तब भी नौ से पांच की ड्यूटी निभातीं ही, क्योंकि 'लाइफ मस्ट गो ऑन..!'


इधर प्लेलिस्ट में गुलज़ार कह रहे हैं...

"सांस लेना भी कैसी आदत है, जिये जाना भी क्या रवायत है..."


आदतें भी अजीब होती हैं...

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