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पुरानी जींस सी दोस्ती

Updated: Aug 5, 2021


वो नोकिया 1108 वाले दिन थे...!


जब गज़ब की फिलॉसफिकल डिस्कशनबाजी के बीच मोबाइल की येलो लाइट जल उठती थी और बंदा रूम से बाहर...!! वो अलग बात है कि डिस्कशन की महफ़िल फिर भी कैरी-ऑन रहती थी. वेल्ले तो हम सभी थे, और इस कदर थे कि अपना एक एडवाइस सेंटर भी खोलना चाहते थे. अब खाली लोग सलाह ही दे सकते हैं, वो भी दूसरों को. उन दिनों बूफ़र ने माहौल की रोमांटिकनेस मेन्टेन करने का काम भी खूब किया था. नेट-वेट तब हम इतना चलाते भी नहीं थे. सस्ते में अनलिमिटेड फ्री टेक्स्ट मैसेज ने आदत ऐसी बिगाड़ी की आज भी फ़ोन ओकेजनली ही किया जाता है.

हम सबकी टेंशन तब हद दर्जे तक बढ़ गई थी जब पता चला की भई अब मैसेज अनलिमिटेड नहीं रहे! और उससे भी बुरा तो तब हुआ जब ये लिमिट 100 मैसेज/डे हो गई !! सबसे मस्त और सबसे पकाऊ बात ये थी की हम सबकी ग्रेजुएशन चार साल की थी, तो बड़े होने की कोई जल्दी रही नहीं कभी. यूँ भी मेच्योर हो जाने से खतरनाक जिंदगी की कोई फेज नहीं होती.


खैर...शिवम् जूस कार्नर से शुरू हुई दोस्ती धीरे-धीरे पिंड बलूची के बिल भरने लगी. ऑरकुट की जगह फेसबुक आ गई. टेक्स्ट करने की लत व्हाट्सएप्प ने मेन्टेन रखी. घर से मिले ए.टी.एम. की जगह कंपनी वाले ए.टी.एम. ने ले ली. अग्रसेन भवन में फ्री की शादी में चप्पल में डांस करने वाले लड़के अब पार्टी में सूट में जाते हैं. कुछ लोगों ने ए.टी.एम. कार्ड मशीन में ही भूल जाने की आदत से भी छुटकारा पा लिया है. कॉलेज के ब्लेज़र में सो जाने वाले लोग फॉर्मल्स में भी स्मार्ट दिखते हैं.


ट्रुथ एंड डेयर के बीच से उठा लड़का मुंबई पहुँच गया..!! फिर एक दिन तगड़े वाली इमोशनल ब्लैकमेलिंग के बाद जब दिल्ली आया तो मेरे लिए फाउंटेन पेन साथ लाया. अब तक सब गिरते-संभलते चलना सीखने लगे हैं, फिर से थोड़ी सी दिल की भी सुनने लगे हैं. उसने कहा था “कुछ लिख कर दिखा इस पेन से...”

मैंने सोचा क्यों न इस पर ही लिखा जाये !


ये बात तो रही 'हाउस नंबर: सी-60' से फाउंटेन पेन तक की. लेकिन इस टाइम-ज़ोन के बीच भी बहुत कुछ है, जो किसी को आज भी डेट और टाइम के साथ याद होगा. तो मैं ये सोच रही थी की जब जिंदगी गाडी पटरी पर आ ही रही है तो क्यों न फिर से आवारगी शुरू की जाए !!!

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