मोनोटोनस जिंदगी
- grannykapitara
- Jul 27, 2021
- 1 min read
Updated: Jul 31, 2021
"उफ्फ...तुम कितनी बोरिंग हो.."
मैंने सामने वाली चेयर पर बैठी मोनोटोनस जिंदगी से कहा.
"तुम न होतीं तो मैं दुनिया भर में फैला तरह-तरह का लिट्रेचर पढ़ती-समझती,कैनवास पर रंग बिखेरती,अपनी कविताएं गुनगुनाती...पुरानी इमारतों और खंडहरों के चक्कर लगाती,बालकनी में पौधे लगाती,चिडियों के दाने-पानी का इंतजाम करती...किसी शाम छत पर चढ़कर यूं ही दूर-दूर तक जो भी दिखता कैमरे में उसे कैद करती....जो भी महसूस करती उससे डायरियां भर देती....पर तुम..."

मोनोटोनस जिंदगी फीका सा मुस्कुराई
"जब मैं तुम्हारी जिंदगी बनी थी तो मैंने भी यही सपने सजाये थे...आखिर तुम मुझे जीती हो...मैं तुम्हें नहीं...मैं तुम पर डिपेन्डेंट हूं,इसलिए आज भी उम्मीद लगा लेती हूं..."
बात साफ हो चुकी थी.
"फ्रेंड्स...??"
मैंने अपना हाथ बढ़ाया. हैंडशेक करते हुए मैंने अपने हाथों पर कई रंगों का गुलाल देखा. ये जिंदगी का सतरंगी पराग था....अब वो मोनोटोनस नहीं रही थी




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