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एपिसोड 1 : नीति - द फ्रॉग एंड द स्कॉर्पियन

Updated: Aug 5, 2021


जिंदगी का एक अच्छा बड़ा हिस्सा हम ये सोचते हुए बिताते हैं कि आखिर जो हमने किया वो क्यों किया, और जो हमारे साथ हुआ वो क्यों हुआ. इस छोटी सी बात को समझने में अक्सर देर ही हो जाती है कि "इसे ऐसे ही होना था".

इसी थीम पर कॉम्प्लेक्स ह्यूमन इमोशंस को समझती- समझाती चलती है कहानी 'नीति - द फ्रॉग एंड द स्कॉर्पियन'

50 साल की नीति किचन में अपने रेडियो पर चल रहे एक शो में 'द फ्रॉग एंड द स्कॉर्पियन' नाम की जातक कथा का जिक्र सुनती है और फ्लैशबैक में ढलती शाम से उसकी कहानी देखने वालों को भी अपने साथ साथ समंदर किनारे के उस कॉटेज में पहुंचा देती है जहां सिर्फ एक वीकेंड में इतना कुछ बीत रहा है जिसे रीक्रिएट करने में एक उम्र का वक़्त लगता है.


यहां नीति और महेश हैं जो सालों से इसी तरह के कई वीकेंड्स साथ बिताते आ रहे हैं. नीति के पास महेश की हर फ्रस्टेशन के लिए सोलेस है और वो ये भी जानती है कि व्हिस्की के कितने पैग्स के बाद उसको ब्रेक की जरूरत होती है, इस तरह महेश के लिए नीति एक जरूरत बन जाती है जिसको वो अपनी सारी नाकामयाबियों से थक- हारकर छुप जाने की एक शांत जगह की तरह देखता है.

नीति महेश को समझती है इसीलिए यह भी जानती है कि बावजूद अच्छे खासे पैसे और पर्सनैलिटी के, महेश का साथ उसे कभी वो नहीं दे सकता जो एक पार्टनर से वह चाहती ही नहीं डिजर्व भी करती है.महेश उन लोगों में से हैं जो रिश्तों में इतने लकी होते हैं कि पाते हुए ये ही भूल जाते हैं कि उन्हें भी कभी कुछ देना था. यही भूल जिद बनकर ईगो के साथ दोनों के बीच आ खड़ी होती है.


उस एक मोमेंट के बाद महेश का जाना और अमर का आना नीति के लिए किसी रोलर कोस्टर से उतरने के बाद की सी फीलिंग बन रहा होता है कि महेश की वापसी सालों पुरानी जातक कथा के बिच्छू की याद दिला जाती है. इसके बाद उन तीन जिंदगियों में जो होता है वो फ्रेम दर फ्रेम इस बात का रिदमिक एक्सप्रेशन है कि हम जो करते है और हमारे साथ जो होता है वो सिर्फ इसलिए कि हम ऐसे ही हैं और इसे ऐसे ही होना था, साथ ही...." वक़्त से पहले आखिरी पन्ना पढ़ना खतरनाक होता है"

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