एपिसोड 3 - प्रयास
- grannykapitara
- Jul 26, 2021
- 1 min read
Updated: Aug 5, 2021
मैं आदमी हूं
बहुत छोटा- छोटा कुछ
जोड़कर बना हूं
- पाश

आशीष का कमरा इसी तरह उसके बिखरेपन की लाइव पोट्रेट है, और कमरे के हर फ्रेम में शामिल टाइमपीस उसके ठहराव का सिंबॉलिक एक्सप्रेशन. वो ठहराव जहां शांति नहीं खुद को लेकर घुटन है, क्रिएटिव बेचैनी है, सिस्टम से नाराज़गी है, जो आसपास किसी पर जाहिर नहीं हो पाती, उस दोस्त पर भी नहीं जो सपोर्ट देने की कोशिश करते हुए भी उसे फेल्योर ही समझता है.
नशे ने उसके दिमाग का सेंसिटिविटी वाला कोई कोना शायद अपने असर से अछूता ही छोड़ रखा है जहां से आवाज आती है "मज़ाक पर तो सब हंसते हैं, मुझपर तो कोई हंसता भी नहीं".
आशीष का खुद के सपनों में अलग- अलग कैरेक्टर और मेकअप में स्टेज पर आना भी सबकॉशियस रिफ्लेक्शन है जो नींद खुलते ही उसे फिर खालीपन में डुबो जाता है.
दिव्या आशीष की खाली गुल्लक जैसी जिंदगी में डाले गए चंद नए सिक्कों की खनक है. दोनों की कहानी न तो प्यार के तयशुदा मुकाम पर पहुंचकर संवर जाने की है न बिखरकर बर्बाद हो जाने की. दोनों के बीच जो है वो उनको बांधता नहीं लिबरेट करता है.
आखिरी दृश्य में रोमियो और जूलियट के रोल में दोनों का हाथ छोड़ते हुए एक साथ अपनी डेस्टिनी से जा मिलना, "....लिव्ड हैपिली इवर आफ्टर!" न भी सही तो किसी तरह अधूरा भी नहीं रहता.




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