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पिक्सी डस्ट

Updated: Aug 5, 2021

जिंदगी के जादू में वही यकीन कर सकता है, जिसे कभी धुली हुई शर्ट से दस का नोट सही - सलामत मिला हो.

सिद्धार्थ को मोहभंग तब हुआ जब उन्होंने जाना की बुढ़ापा, रोग और मृत्यु दुख के कारण हैं. उस सैर के पहले तक उनके लिए हर तरफ सुख ही सुख था. हमारे दौर की उलझन ये है कि एक नई जिंदगी को लाना पोस्टपार्टम डिप्रेशन कैसे बन जाता है? यूं तो हर रोज स्क्रीन पर मुस्कुराते चेहरे ही दिखते हैं!

एक दिन जब मेरे पेंसिल पाउच में पिक्सी- डस्ट कम पड़ने लगी तो चाय के बहाने दोस्त के घर चली गई. कुछ दिन बिना अदरक की चाय जैसे होते हैं...हम उन्हें बिता तो देते हैं, लेकिन एक खालीपन की कसक के साथ.


दिन बिताने को जब और कुछ ना सूझे तो बात करना अच्छा होता है. बातें धीमी आंच पर भुनते पकौड़ों जैसी होती हैं, खासा वक़्त लेती हैं ! वक़्त में उन दिनों 'क्रिस्प' की कमी सी थी.


वो दिन भी ' जस्ट अनॉदर डे ' बनने को ही था कि बालकनी में अचानक ऊपर से उड़ता हुआ ये पेपर आ गिरा. यही वो लिफ़ाफा था जिसमें कुदरत ने मुझे मेरी ' पिक्सी- डस्ट ' भेजी थी.

"मैं इसे ले जा रही हूं."

घर आकर कुछ दिनों बाद मैंने इसे कलर किया. उस 10-15 मिनट में, जब मेरे हाथ इस वंडर वुमन में रंग भर रहे थे, मेरी सारी क्रिएटिविटी अपना एक- एक रंग मिलाकर उस इन्द्रधनुष को पूरा करती जा रही थी जो एक लंबे क्रिएटिव ब्लॉक के धुंधले मौसम के बाद साफ चमकते कैनवस पर उतर रहा था.


हर फैंटेसी में एक सच्ची बात जरूर होती है और विश्वास अटूट हो तो ' पिक्सी- डस्ट ' भी मिलती है.

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