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आफतों के दौर में, चैन की घड़ी है तू 🎶

Updated: Aug 5, 2021


बचपन में मैं घर से भाग जाना चाहती थी.

जब ये बात उस दिन रिक्शा में बैठे-बैठे बताई थी तो तुम कितना सोच में पड़ गये थे. हम पोस्ट ऑफिस से मनीऑर्डर कलेक्ट करने जा रहे थे. तुम्हारी सबसे अच्छी बात की ज्यादा सवाल नहीं करते, और मुझे पुराना कुछ भी याद नहीं करना पड़ता.

'घर' भी अपने आप में एक यूटोपिया है. मुझे घर खरीदते लोग बहुत अजीब लगते हैं.

अक्सर हमसे सवाल होने लगा है, "तुम लोग घर कब खरीदोगे?"

घर खरीदा नहीं जा सकता.

मेरा घर सुबह तुम्हारे जाने के बाद उसी बिस्तर पर छोटी सी नींद है, कि मैंने तेरह बरस की उम्र से ही एम. जी. में खरीदी नींद को जान लिया था. किसी रात तुम्हारी उतारी शर्ट पहनकर सुबह की शुरूआत करना मेरे लिए हमेशा घर में होने जैसा रहा है, फिर जगह चाहे जो भी रहे.


कहने को ये भी कहा जा सकता है कि मेरा सोचना बहुत इम्मैच्योर है. लेकिन बिखरे हुए बीस सालों से अगर मैं अपना बचपना किसी पाॅकेट में छिपा के बचा लाई तो ये कम से कम बुरी बात तो न हुई.


इस दुनिया को बच्चों की बहुत जरूरत है.


बच्चे 'प्लान' नहीं किए जाते.

उन्हें जिंदगी में शामिल करना 'प्लान' जैसे मैकेनिकल प्रोसेस से बहुत आगे की चीज है. यहां-वहां मन्नत मांगने और हाॅस्पिटल्स के चक्कर काटने से भी आगे की. ये बात अच्छी है कि तुम भी इससे इत्तेफाक रखते हो. हां तुम एक अच्छे गार्जियन हो और मैं चाहती हूं कि कोई इस बात को बचपन से जाने. मुझे मौका थोड़ा लेट मिला न!


जिंदगी प्यार से रहने को भी बहुत छोटी है, और मैं जी लेने की जल्दी में हूं. ताकि किसी दिन जब मुझे जाना हो तो तुम उसी तरह मेरा हाथ थामे हौसला देते हुए विदा करो जैसे अक्टूबर की उस रात पापा ने मम्मी को भेजा था.♥

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