थीईन प्रेमियों के लिए
- grannykapitara
- Jul 27, 2021
- 2 min read
Updated: Aug 6, 2021
अगर आप चाय के शौक़ीन हैं तो अब तक चाय बनाते/बनवाते, पीते/पिलाते इतना एक्सपीरिएंस तो हो ही गया होगा की उबलते वक़्त और कप में डालने के बाद उठने वाली महक से ही अंदाज़ा लगा लें की चाय का स्वाद कैसा होगा !

‘मसाला चाय’ भी कुछ ऐसा ही असर करती है. जब हाथ में आते ही सबसे पहले नज़र जाती है इसके कवर पर. हल्की नज़र से देखने की आदत रखने वालों के लिए ये सिर्फ येलो बैकग्राउंड पर एक कप का डिजाईन है, जिस पर किताब का नाम छपा है. लेकिन असल में ये कवर ही किताब के अन्दर की कहानी कह जाता है. ‘मसाला चाय’ से भरा एक कप, आस-पास बिखरे चाय के धब्बों के बीच अलग-अलग इमोशंस वाली अलग-अलग एज ग्रुप्स की स्माइलीज जो आड़ी-तिरछी लाइन्स से पहले आपस में और फिर अलग-अलग शेप्स और साइज़ के बहुत से चाय के कप्स से जुड़ जाती हैं.
कुछ ऐसी ही हैं किताब के अन्दर की कहानियाँ. ये कहानियाँ हमें हमारे आस-पड़ोस की दुनिया के पीछे छिपी एक और दुनिया में ले जाती हैं जहाँ सुबह की चाय के वक़्त ‘bed tea’ जैसे कितने ही 'गौरव ' अखबार में छपे ताकत बढाने के एड को नज़र बचाकर, मगर ध्यान से पढ़ रहे हैं, तो कहीं शाम की चाय के साथ जमी महफ़िलों में गरमागरम गॉसिप परोसी जा रही है जिसका हॉट टॉपिक कोई भी हो सकता है! चाहे वह ‘fill in the blank’ की ‘कावेरी’ हो, ‘हम दो हमारा एक’ की ‘कविता भाभी’ या फिर ‘keep quite’ की ‘धुन’, दिव्य की किताब इन सबके अन्दर तक झांकती है, और हमें अहसास होता है की कुछ बहुत ही कोमल पट्टियां जब सूख जाती हैं तभी चाय का मसाला तैयार होता है.
यह किताब हमें नॉस्टाल्जिक भी फील कराती है. हम सोचते हैं की हमारी डिग्री के चार साल किसी ‘फलाना कॉलेज ऑफ़..’ के हॉस्टल और कैंटीन में चाय पीते-पिलाते कितनी जल्दी बीत गए. जैसे अभी की ही तो बात थी ! पर असल में जब हम जिग्सा पज़ल के टुकड़ों सी बिखरी अपनी जिंदगी पर नज़र डालते हैं तब अहसास होता है की ‘सही टाइम’ का बहाना करके हम खुद से ही भाग रहे हैं. ‘टाइम’ हमें बताती है की सही टाइम जैसी चीज़ के इंतज़ार से कुछ हासिल नहीं होता, वो तो बस एक मूमेंट होता है जो आता है और गुज़र जाता है. फर्क इस बात से पड़ता है की हम में से कितने ‘अंकित’ उसे पहचान पाते हैं. वरना तो खैर ‘jeevanshadi.com’ की तरह कोई न चाह कर भी ‘मानसी’ को याद कर रहा है, खुद में उलझी ‘गरिमा’ , ‘love you forever’ की ‘हिमानी’ की तरह उलझी सी जी रही है.
यंगस्टर्स के इश्यूज को बहुत ही सहज तरीके से लिखने वाले दिव्य की चाइल्ड सयकोलोजी की समझ ‘केवल बालिगों के लिए’ में अच्छी तरह दिखती है. सरल सहज भाषाशैली के अलावा दिव्य की कहानियों की खासियत यह है की ये हमें अब तक बितायी जिंदगी में पीछे ले जाकर उस जगह खड़ा कर देती हैं, जहाँ हम ‘आर्यन’ की तरह लड़ना-झगड़ना चाहते हैं और ‘विद्या कसम’ खाना चाहते हैं, फिर धीरे-धीरे बड़े होते हुए किसी शाम ‘Ruby spoken English class’ के बाहर खड़े होकर ‘पहलवान भाई’ की मसाला चाय पीना चाहते हैं !


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