वात्स्यायन का वर्जिन देश
- grannykapitara
- Jul 26, 2021
- 4 min read
Updated: Aug 6, 2021
क्या आपने 'कामसूत्र' पढ़ा है ?
'वात्स्यायन' कृत 'कामसूत्र' ??
मैंने पढ़ा है.
हम सब के लिए यह एक मस्ट- रीड है.

मैं एक मेडिकल ग्रेजुएट हूं, और इस नाते हर हार्मोन की नब्ज की समझ भी है. जेंडर, एनाटोमी, सेक्स, मेनस्ट्रूएशन टेबोज नहीं हैं. हालाँकि हमारे यहाँ सिनेमा में भी “आई ऍम वर्जिन” सेंसर्ड है ! (वो अलग बात है की वर्जिनिटी का सर्टिफिकेट लड़कियों के लिए आधार कार्ड से भी ज्यादा जरुरी है.) खैर सेंसर बोर्ड का तो क्या कहें, उसे तो “पल्लू के नीचे छुपा के रखा है उठा दूँ तो हंगामा हो” में भी हंगामे लायक कुछ नज़र नहीं आता. ये एंटरटेनमेंट है !
एक और बड़ा पॉपुलर एंटरटेनमेंट है, पोर्न साइट्स’!
एक बार गूगल सर्च की देर है और हजारों ऐसी साइट्स सामने होंगी. जहाँ ऑडियो- वीडियो क्लिप्स से लेकर कहानियों तक सब कुछ मिलेगा. (अब चाहे स्वर्गीय साहित्यकार ‘कहानी विधा’ पर चित्रगुप्त की अदालत लगा लें पर साईट ओनर और उनके रीडर इन्हें कहानियाँ ही कहते हैं..!)
उस पर मेहरबानी सस्ते डाटा प्लान्स की, कि पोर्न का ये मार्केट आसानी से हर किसी की पहुँच में है. जरुरत है तो सिर्फ एक मोबाइल फ़ोन और इन्टरनेट कनेक्शन की. बिना किसी चेक्स या रेस्ट्रिक्शन के हर किसी के लिए अवेलेबल ये पोर्न सेक्स की बात नहीं करता. यहाँ एबनॉर्मल पैटर्न्स भरे पड़े हैं. हर जगह मेंटल और फिजिकल ह्यूमिलेशन है. चाहे वो रिश्तों से डील करती सेक्स स्टोरीज हों या ब्रूटालिटी की लिमिट क्रॉस करते वीडियोज !
जरा सोचिये, जहाँ डियो लगाने का परम उद्देश्य भी सिड्यूस करना हो (मैं नहीं खुद डियो के ऐड कहते हैं!) वहां इस तरह के पोर्न्स का क्या असर पड़ रहा होगा ??
ज़ाहिर है हर कोई ह्यूमन एनाटॉमी नहीं पढता, इसलिए हर किसी को इसकी समझ भी नहीं होती. उस पर हमारा सो-कॉल्ड सोशल सेंसर ! सेक्स पर बात तो दूर, प्युबर्टी की तरफ बढ़ते बच्चों को एजुकेट करना भी जरुरी नहीं समझा जाता. टीन ऐज में कदम रखते बच्चे अपने ही शरीर के बारे में कुछ नहीं जान पाते. खासकर लड़कियों में तो घर की तरफ से ही इस कदर फोबिया पैदा कर दिया जाता है कि सेनिट्री और हेल्थकेयर तो दूर पीरियड्स के दिनों में स्कूल में वो पैड भी टाइम पर चेंज नहीं कर पाती.
इस तरह के पर्दों के पीछे पलते रहते हैं इन्फेक्शनस और जेनाइटल डिसऑर्डर्स. लगभग हर घर में ये टॉपिक्स अनटचेबल ही हैं. स्कूल्ज में सेक्स एजुकेशन देने की बात आये तो आग लगा दें सामाजिक संगठन. इस तरह के माहौल में सही-गलत, नॉर्मल-एबनॉर्मल, सेक्स- ह्यूमिलेशन में फर्क करने की समझ कितनों को मिलती है? बहुत से लोग जो भी दिखाया-पढाया जा रहा है उसे ही फैन्टासाइज करने लग जाते हैं. हाल ही में कई सेक्सुअल क्राइम्स की जड़ों में भी पोर्न फैंटासी थी.
ऐसा भी नहीं है की इस बारे में कभी कुछ कहा- सुना ही नहीं गया.
सेक्स पर बात तो वात्स्यायन ने 300 C.E. में ही शुरू कर दी थी, कामसूत्र लिखकर.
कामसूत्र पोर्न या इरोटिका नहीं, सेक्स एजुकेशन की थीम पर लिखी गई किताब है. भले ही डिटेलिंग के मामले में वात्स्यायन हमारे टाइम से कितना भी पहले की बात करते हों, पर लोगों को एजुकेट करने का उनका जो पर्पज था उसमे आज भी ये किताब अपने 26- चैप्टर्स में कहीं भी कम नहीं पड़ती. बुक स्टोर्स के कोनो में तलाशेंगे तो जरुर आपको वात्स्यायन कृत कामसूत्र कई लैंग्वेजेज और वर्जन्स में मिल जाएगी, जिसे आमतौर पर लोग नज़र बचा कर देखते तो जरुर हैं, पर न तो खरीदते हैं और न किसी से जिक्र करते हैं.
वात्स्यायन के समय से बहुत आगे आज हम 2021 में हैं. हमारी सोसयटी में कई तरह के ‘फ़िल्टर’ हैं, लड़के-लड़कियों की दोस्ती में फ़िल्टर, कपड़ों में फ़िल्टर, प्यार और शादी में कास्ट और रिलिजन के फ़िल्टर. पर पोर्न साइट्स पर एक ही फ़िल्टर है, ”18+?” और ‘ओके’ या ‘यस’ की टैब जितनी आसानी से मैं क्लिक कर सकती हूं उतनी ही आसानी से प्राइमरी क्लासेज का बच्चा. सिर्फ एक ‘टच’ की देरी है !
बात सिर्फ बच्चों की पहुँच की ही नहीं है, जिस 18+ वाली पापुलेशन को ये फ़िल्टर एलॉओ करता है उसे भी सही समझ कौन देगा? बिना अपने शरीर को जाने, बिना एक हेल्दी फिजिकल रिलेशन का कॉन्सेप्ट समझे उन्हें कैसे पता चलेगा की सेक्स उतना ही नार्मल है जितना सुबह से शाम तक के रूटीन में कोई भी और काम ? अपोजिट सेक्स के लिए सेंसिटिविटी कैसे आयेगी ?? इसलिए सेक्स एजुकेशन तो जरूरी है ही, इरोटिका को भी सही एंगल से समझने की जरुरत है. ह्यूमिलेटिंग पोर्न और इरोटिका ज़ेनेर में सिकनेस और सेंसेस का फर्क है. इस फर्क को समझकर किसी भी तरह की मेंटल शिट फैलने से रोकना ही असल बात है.
‘बिलो द बेल्ट’ हिट से पहले जरुरी हैं ‘टॉप ऑफ़ द ब्रेन’ हिट मिलना.
इस काम में जितना रोल और रेस्पॉन्सिबिलिटी गवर्नमेंट अथॉरिटीज की हैं उस से कहीं ज्यादा हर एक सिटीजन की. जिसकी शुरुआत अपने लेबल पर हम सब को खुद ही करनी होगी. क्योकि हर मार्केट कस्टमर से बनता है. डिमीनिंग, ह्यूमिलेटिंग और ब्रूटल पोर्न का हर जगह से हटना सोसयटी की मेंटल हेल्थ के लिए बहुत जरुरी है. साथ ही जरुरत है इरोटिका तक पहुँचने से पहले सेक्स एजुकेशन की, और ऐसे फिल्टर्स की जो वाकई 18+ के लिए बने हों.

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